Hislopia Journal

मोहन राकेश के नाटक ‘आधे-अधुरे’और ‘पैर तले की जमीन’ में प्रतिक-बिम्ब

मनोहर कुमार

Published in Vol.16, 2026

KEYWORDS: घर, साहित्य, समाज, प्रतीक, नाटक

ABSTRACT:

मोहन राकेश व्यक्ति को समाज से कभी भी अलग नहीं किया। उनका मानना था कि व्यक्ति से मानव-समाज तक का सफर ही सफर की मंजिल है और हर व्यक्ति को उस मंजिल तक पहुँचना है। लेकिन बीच में परिवार है। ’’लहरों के राजहंस’’ में उन्हें घर से विरक्ति हो जाती है, लेकिन एक द्वन्द्व में, यह निर्णय उनका नहीं नियति का है। ’’पैर तले की ज़मीन’’ में घर की नींव ही नहीं है। घर का नींव पती-पत्नी का प्यार है जो घर को ’घर’ बनाता है, उसके विश्वास उस घर को आधार प्रदान कर उसे मजबूत बनाता है, और जिसका अभाव ’घर’ को नरक बना देता है। मोहन राकेश के नाटकों में विश्वास की कमी हमेशा नज़र आता है।

मोहन राकेश के संपूर्ण नाटकों में ’घर’ केन्द्र में है। मोहन राकेश का अपना ’घर’ तो हमेशा उजड़ते गया किन्तु उनकी स्वानुभूति की अभिव्यक्त रचना लाखों घरों को उजड़ने से बचाएगा। आज आधुनिक समाज भौतिकता के जाल में फंसते जा रहा है जहाँ व्यक्ति वस्तु बनकर रह गया है। इस भौतिकवादिता में संबंध के मायने बदलते जा रहे हैं। संबंध की मर्यादा खत्म होती जा रही है। संबंध की भावनाओं को उपयोगिता की दृष्टि से देखते हैं। डर है कि कहीं यह समाज को बिखेर न दे। मोहन राकेश की ये कृति संभवतः ऐसी परिस्थिति में लोगों का मार्ग दर्शन करेगा। ऐसे महान रचनाकार के हम हमेशा ऋणी रहेंगे।

DOI: https://doi.org/10.64833/hislopia.j.vol.16.issue1.134